मौनी महाराज जी की पुण्यतिथि कार्यक्रम को सफलता पूर्वक सम्पन्न् कराने मे विशेष योगदान हेतु माननीया जिलाधिकारी महोदया को स्मृति चिन्ह देकर आभार प्रकट करते हुए
मौनी महाराज जी के पुण्यतिथि कार्यक्रम में दिनांक 14-10-2022 को खेल मंत्री गिरिश चन्द्र यादव जी का मुख्य अतिथि के रूप में गरिमामयी उपस्थिति
श्री हनुमान गढ़ी सेवाश्रम ट्रस्ट द्वारा आयोजित कम्बल वितरण कार्यक्रम में गरीब असहाय व जरूरतमंद लोगों को माननीय अम्बरीष सिंह भोला जी के हाथों कम्बल वितरित करते हुए
नादी निधौरा स्थित गंगा घाट के पक्का निर्माण एवं सुन्दरीकरण हेतु अपर जिलाधिकारी को सौंपा ज्ञापन
🚩 श्री हनुमान गढ़ी सेवाश्रम ट्रस्ट में आपका हार्दिक स्वागत है! 🚩 सभी श्रद्धालु भक्तजनों को सादर वंदन एवं अभिनंदन 🙏 जय बजरंगबली!

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श्री हनुमान गढ़ी सेवाश्रम ट्रस्ट

आप सभी श्रद्धालु भक्तजनों का हार्दिक स्वागत एवं अभिनन्दन करता है

        "श्री हनुमान गढ़ी सेवाश्रम ट्रस्ट" एक पंजीकृत, गैर-लाभकारी संगठन है, जो सामाजिक, धार्मिक तथा लोककल्याण के कार्यों हेतु समर्पित अत्यंत प्रतिबद्ध व्यक्तियों का समूह है। यह ट्रस्ट न केवल धार्मिक एवं सांस्कृतिक जागरूकता का संवाहक है, बल्कि समाज के उपेक्षित, जरूरतमंद और असहाय वर्गों को आत्मसम्मानपूर्ण जीवन प्रदान करने हेतु निरंतर कार्यरत है।

मुख्य उद्देश्य गतिविधियाँ :

  • निर्धन, असहाय, जरूरतमंद एवं अपंग व्यक्तियों को दवा एवं आवश्यक सहायता प्रदान करना।
  • निर्धन कन्याओं के विवाह हेतु सहयोग देना।
  • पर्यावरण संरक्षण एवं स्वास्थ्य संबंधी जन-जागरूकता व स्वच्छता अभियान चलाना।
  • युवाओं में शिक्षा के प्रति जागरूकता उत्पन्न करना।
  • धार्मिक, सांस्कृतिक, सामाजिक एवं आध्यात्मिक कार्यक्रमों हेतु भवनों/पंडालों का निर्माण।
  • हिन्दू धर्मावलम्बियों व मानव कल्याणार्थ अनुष्ठान, पूजा&पाठ, यज्ञ-भण्डारा, भजन कीर्तन, आदि के साथ धार्मिक व सांस्कृतिक कार्यक्रम आयोजित करना⁄ कराना।
  • बाढ़, सूखा, अग्निकाण्ड एवं भयंकर बीमारियों जैसे दैवीय आपदा से पीड़ितों की यथासंभव सहायता करना
  • गरीबों को वस्त्र वितरण एवं संत-महात्माओं की सेवा।

प्रेरणा स्रोत:

         इस ट्रस्ट की स्थापना 21 जुलाई 2015 को परम पूज्य श्री श्री 1008 रामकिंकर दास मौनी महाराज जी की प्रेरणा व मार्गदर्शन में हुई। उनका व्यक्तित्व  त्याग, तपस्या, आध्यात्मिक दृष्टि,समर्पण और निःस्वार्थ सेवाभाव ही इस संस्था की मूल प्रेरणा शक्ति है। श्रीहनुमान जी की कृपा से जनमानस में धार्मिक चेतना, सेवा, संस्कार, समर्पण और प्रेम की भावना जागृत हो, इस पवित्र उद्देश्य से इस ट्रस्ट की स्थापना की गयी है।

अवस्थित स्थान महत्व :

     यह ट्रस्ट उत्तर प्रदेश राज्य के जनपद चन्दौली के ग्राम सभा नादी निधौरा में स्थित है। यह न केवल इस क्षेत्र की आध्यात्मिक विरासत का प्रतीक है, बल्कि सामाजिक समरसता, आस्था और भक्ति का भी केंद्र है।

श्री हनुमान गढ़ी सेवाश्रम ट्रस्ट की स्थापना:

“श्री हनुमान गढ़ी सेवाश्रम ट्रस्ट” की स्थापना 21 जुलाई 2015 को परम पूज्य श्री श्री 1008 रामकिंकर दास मौनी महाराज जी की प्रेरणा एवं शुभ मार्गदर्शन में की गई है। इस ट्रस्ट का उद्देश्य धार्मिक, सांस्कृतिक और सामाजिक गतिविधियों का संचालन करते हुए जनमानस में आध्यात्मिक चेतना एवं सामाजिक उत्तरदायित्व का  संचार हो सके इस पवित्र भावना के साथ की गई है।

                इस ट्रस्ट का मुख्य उद्देश्य है- जनमानस को अपने धार्मिक और सामाजिक कर्तव्यों के प्रति जागृत  करना तथा मौनी महाराज जी के विचारों और सेवा भावना को जन–जन तक प्रचारित व प्रसारित करना जिससे लोग उनके पदचिन्हों पर चलकर धर्म, ज्ञान, संस्कृति, संस्कार, शिक्षा, स्वास्थ्य और समाजसेवा हेतु समर्पित हो सके । यह एक पंजीकृत, गैर-लाभकारी संगठन है । जो भारतीय ट्रस्ट अधिनियम  के तहत पंजीकृत है ।

संस्थापक एवं नेतृत्व:

                     इस ट्रस्ट के प्रथम अध्यक्ष परम तपस्वी श्री रामकिंकर दास मौनी महाराज जी रहे हैं। कार्तिक माह के कृष्ण पक्ष की नवमी तिथि (09 नवम्बर 2020) को इनके ब्रम्हलीन हो जाने के पश्चात् उनके विचार, त्याग, समर्पण और आध्यात्मिक प्रेरणा व उनके सेवाकार्य को आगे बढ़ाने हेतु उनके परम शिष्य श्री श्यामसुन्दर दास जी को इस ट्रस्ट का अध्यक्ष मनोनित किया गया है।

      इस न्यास के संस्थापक ⁄ ट्रस्टी  श्री आलोक प्रकाश जी हैं। जो मौनी महाराज जी के परम भक्त एवं उनके सेवाकार्य हेतु सदैव समर्पित रहते हैं।

प्रमुख गतिविधियाँ:

                 मौनी महाराज जी के विचारों एवं सेवा परंपरा को आगे बढ़ाते हुए ट्रस्ट द्वारा नियमित रूप से धार्मिक अनुष्ठान, सांस्कृतिक आयोजन, समाजसेवा, चिकित्सा शिविर, एवं शिक्षा–संवर्धन से जुड़ी गतिविधियाँ आयोजित की जाती हैं।

भूतपूर्व अध्यक्ष/पीठाधीश्वर

श्री रामकिंकर दास (मौनी महाराज जी) जिन्हें मौनी महाराज जी के नाम से भी जाना जाता है, संस्था के पूर्व अध्यक्ष/पीठाधीश्वर रहे हैं। उनके मार्गदर्शन, तपस्या और आध्यात्मिक योगदान से संस्था की नींव मजबूत हुई। उन्होंने धर्म, सेवा और साधना को समर्पित जीवन जीते हुए समाज को प्रेरित किया।

वर्तमान अध्यक्ष

श्री श्याम सुन्दर दास जी वर्तमान में संस्था के अध्यक्ष के रूप में कार्यरत हैं। वे संगठनात्मक कुशलता, सेवा भाव और भक्तिमय नेतृत्व के प्रतीक हैं। उनके नेतृत्व में संस्था निरंतर प्रगति के मार्ग पर अग्रसर है और समाज सेवा में योगदान दे रही है।

🟧 पदेन सदस्य

क्रम संख्यानामपद
1काश्मिरी लालउपाध्यक्ष
2आलोक प्रकाशप्रबन्धक / न्यास ट्रस्टी
3मनोज कुमारकोषाध्यक्ष
4मृत्युन्जय कुमारसचिव

संक्षिप्त इतिहास (History):-

🕉️ मौनी महाराज जी का जीवन परिचय

मानव रूप में जन्म लेकर भी कुछ आत्माएं ईश्वर के विशेष उद्देश्य को पूर्ण करने के लिए इस धरती पर अवतरित होती हैं। ऐसे ही एक दिव्य आत्मा थे — श्री श्री 1008 रामकिंकर दास मौनी महाराज जी

              इनका जन्म 22 मार्च 1905 को हुआ था, किन्तु उनका जन्मस्थान और जाति रहस्य में है — जैसे ईश्वर स्वयं अपने चमत्कारी अवतारों की पहचान को कभी-कभी छिपा लेते हैं। कुछ लोग कहते हैं कि वे कानपुर के रहने वाले थे, लेकिन इसका कोई प्रमाण नहीं है।

            इनका बचपन का नाम रामकिंकर था। इनके पिता का नाम देव भूषण दास था।  माता-पिता का साया बचपन में ही उठ गया, किन्तु ईश्वर ने उन्हें एक दिव्य मार्ग पर अग्रसर कर दिया।

🧘‍♂️ गुरू से भेंट और मौन व्रतः-

          लगभग 9 वर्ष की आयु में चित्रकूट के वनदेवी आश्रम पहुँचे, जहाँ मजगन्दन दास जी जैसे तपस्वी साधु ने उनकी दिव्य चेतना को पहचाना । वहीं रहते हुए उन्होंने शिक्षा प्राप्त की और मजगन्दन दास को ही अपना गुरु मान लिया। बचपन में वे बहुत नटखटी थे और बहुत बोलते थे। 

           एक दिन उनके गुरु ने कहा–  तुम बहुत बोलते हो, अब मौन रहो।

           यह वाक्य उनके जीवन का संकल्प बन गया। तभी से वे मौन व्रती बनकरमौनी बाबा कहलाने लगे।

         यह मौन केवल बाह्य नहीं, आंतरिक आत्म-चिंतन का माध्यम भी था। जैसे श्रीराम के भक्त हनुमान जी बल, बुद्धि और निष्ठा से युक्त हैं, वैसे ही मौनी महाराज भी वाणी त्यागकर आत्मा से परमात्मा की यात्रा पर चल पड़े।

📿 कवलपुरा आश्रम की ओर यात्रा

            बचपन में ही उन्होंने सीताराम नाम संकीर्तन को जीवन का आधार बनाया। लगभग 12 वर्ष की उम्र में, चंदौली जनपद के धानापुर ब्लॉक स्थित कवलपुरा गांव में पहुंचकर उन्होंने 7 दिन का श्री सीताराम संकीर्तन करवाया तो इसमें क्षेत्र के श्रद्धालु इतने प्रभावित हुए कि उन्होंने मौनी बाबा को हृदय से स्वीकार कर लिया।। 

          इस संकीर्तन में नादी निधौरा गांव (ब्लॉक चहनियां, जनपद चंदौली) से मदन मोहन पांडेय ‘पांचू कुम्हार’, सीताराम, सियाराम बाबा जैसे श्रद्धालु भी गंगा नदि के रास्ते नाव से  उपस्थित हुए। 

          परंतु, जैसे हर सत्य साधना को ईर्ष्या और परीक्षा से गुजरना पड़ता है, वैसा ही उनके साथ हुआ। इस संकीर्तन से लोगों का मौनी बाबा से गहरा लगाव बढ़ता हुआ देखकर कवलपुरा आश्रम के महंत को ईर्ष्या हुई और उन्होंने मौनी बाबा को वहाँ से निकाल दिया।

🚣हनुमान गढ़ी – एक तपोभूमि की स्थापनाः-

          कवलपुरा आश्रम से निकाले जाने के बाद, वे नादी निधौरा के लोगों के साथ (संकीर्तन के पश्चात) लौटते हुए बिना बोले, बिना कहे उसी नाव में बैठ गए — यह संकेत था उनकी आत्मिक मंज़िल का।

         गांव के लोगों ने श्री सूरज शाव (जायसवाल) द्वारा  “हनुमान मंदिर” के नाम से दान में दी गई की भूमि पर उन्हें स्थान दिया । जहाँ कभी भय और सुनशान जंगल था, वहाँ आज भक्ति और दिव्यता की गूंज है।
हनुमान जी की कृपा से वहाँ उन्होंने हनुमान मंदिर (हनुमान गढ़ी) की स्थापना की।
        यह कोई साधारण मंदिर नहीं, बल्कि मौनी महाराज के संकल्प, तपस्या और भक्तों की श्रद्धा से सींची गई एक चेतन भूमि है। जो इस क्षेत्र के आध्यात्मिक पृष्ठभूमि का एक प्रतीक है, और सनातन परम्परा एवं वैष्णव धर्म का पर्याय भी है।

यह स्थान एक ऊर्जा केंद्र बन गया, जहाँ हर भक्त को शांति और आशीर्वाद प्राप्त होता है।

🙏राम जानकी मन्दिर का निर्माण और पीठाधीश्वर की भूमिकाः-

         लगभग 1936 ई० में, श्री श्री 1008 रामकिंकर दास मौनी बाबा, इस हनुमान गढ़ी मंदिर के मुख्य महंतपीठाधीश्वर बने। उन्होंने इसे अपनी कर्मभूमि व तपोस्थली के रूप में सींचा ।  श्री राम जानकी मंदिर का शिलान्यास कराकर धन अर्जित करने हेतु चित्रकूट में वनदेवी आश्रम  चले गए। 14 मार्च 1970 ई० को मंदिर का निर्माण पूर्ण हुआ एवं भगवान श्रीराम व माता जानकी की मूर्ति की प्राण प्रतिष्ठा कराई।

🌍 देशभर में प्रचार

🕉️चित्रकूट का वनदेवी आश्रमगुरु भूमि का वैभवः-

          जहाँ से उन्होंने आध्यात्मिक जीवन प्रारंभ किया, वहीं बार-बार आते–जाते रहे थे। वनदेवी आश्रम आज भी उनके संकल्प और भक्ति का जीवंत प्रतीक है। चित्रकूट के वनदेवी आश्रम में ही मौनी महाराज जी की शिक्षा दीक्षा पूर्ण हुई थी।     

          धर्मनगरी चित्रकूट का यह वनदेवी आश्रम एक बहुत ही प्राचीन व पवित्र स्थान⁄ मंदिर है। इसी स्थान पर प्रभु श्री राम वनवास काल में वनदेवी की पूजा करते थे। आज भी इस स्थान पर एक छोटे से मंदिर में माता सीता के पदचिन्ह विराजमान है। नवरात्र ,दीपावली, हनुामन जयन्ती व अन्य त्यौहारों पर लोग यहां आते हैं और दर्शन पूजन करते हैं। प्रत्येक वर्ष गुरू पूर्णिमा पर नादी निधौरा, वाराणसी, कानपुर, ग्वालियर, सतना, कलकत्ता एवं अन्य प्रदेशों एवं अन्य जनपदों से काफी संख्या में मौनी बाबा के शिष्य एवं श्रद्धालु यहां आकार पूजन अर्चन कर भण्डारा व प्रसाद ग्रहण करते हैं।

          यह स्थान रामघाट एवं हनुमान धारा के बीचों बीच स्थित है। श्रद्धालु रामघाट स्नान व दर्शन पूजन करके इस वनदेवी आश्रम का दर्शन पूजन करते हुए तब हनुमान धारा एवं अन्य धार्मिक स्थानों पर दर्शन करने जाते हैं।

          नादी निधौरा से श्री राम जानकी मंदिर का शिलान्यास कराकर मौनी महाराज जी चित्रकूट  आये और यहां भी उन्होंने 7 महीने का संकीर्तन कराया और धन संग्रह हेतु कलकत्ता, कानपुर, ग्वालियर आदि स्थानों पर गए। वहां के लोग उनके तेज और तप से प्रभावित हुए और उनके शिष्य बन गए।

          आज भी चित्रकूट के इस वनदेवी आश्रम में मौनी महाराज जी द्वारा संकल्पित अनिश्चित कालीन सीता राम संकीर्तन 50 वर्षों से अनवरत” चल रहा है। प्रत्येक वर्ष चैत्र माह की पूर्णिमा पर इस संकीर्तन की वर्षगांठ मनायी जाती हैं एवं भण्डारा व प्रसाद भी वितरित किया जाता है।

🔥 1008 महायज्ञों का संकल्पः-

          अपने जीवन में मौनी महाराज जी ने फलाहार मौन रहकर नादी निधौरा, चित्रकूट, कानपुर सहित विभिन्न स्थानों पर कुल 1008 महायज्ञ कराए।  यह न केवल धार्मिक अनुष्ठान थे, बल्कि जनजागरण, धर्म प्रचार और लोककल्याण का माध्यम भी बने।

           यज्ञों में उन्होंने केवल वैदिक विधियों का पालन ही नहीं किया, बल्कि हर यज्ञ में आत्मिक शक्ति का संचार किया। जो उनका एक अद्भुत संकल्प था।

इसीलिए उन्हें नाम मिला श्री श्री 1008 रामकिंकर दास मौनी महाराज जी”—

मौलिक विशेषताएं और आध्यात्मिक दृष्टिकोणः-

  • मौनी बाबा का जीवन निष्काम सेवा, त्याग, और निष्कलंक भक्ति का उदाहरण है।
  • उन्होंने कभी किसी से कुछ नहीं मांगा — केवल प्रभु की इच्छा को स्वीकार किया और उसे ही अपने जीवन का आधार बनाया।
  • वे मानते थे कि — भक्ति शब्दों से नहीं, आत्मा की पुकार से होती है।

श्री श्री 1008 रामकिंकर दास मौनी महाराज जी के चरित्र की दिव्यता :-

          विश्व में भक्ति या भक्त की उपमा ही श्री हनुमान जी से ही दी जाती है क्योंकि इनके जैसा न भक्त हुआ न होगा । ऐसे ही हमारे श्री मौनी महाराज जी हनुमान जी के परम भक्त थे। श्री महाराज जी ने अपना सर्वश्व श्री हनुमान जी को समर्पित कर दिया था ।

           हनुमान जी की भांति, वे कभी भी अपने चमत्कारों का प्रदर्शन नहीं करते थे, किंतु उनका तेज, मौन और कर्म, स्वयं उनकी दिव्यता को दर्शाता है।
उनके पास आने वाला कोई भी व्यक्ति शांति, श्रद्धा और प्रेरणा लेकर लौटता था।

         श्री श्री 1008 रामकिंकर दास मौनी महाराज जी का जीवन हमें सिखाता है कि भक्ति का मार्ग वाणी से नहीं, त्याग, सेवा और मौन साधना से खुलता है।
उनका हर कदम, हर संकल्प, हर मौन – एक युग को दिशा देने वाला था।

Quality Services

Professional Services

1. कन्या पूजन – शारदीय व चैत्र नवरात्रि (2016-17)

श्री हनुमान गढ़ी सेवाश्रम ट्रस्ट द्वारा नवरात्रि के पावन अवसर पर कन्या पूजन का आयोजन किया गया जिसमें नौ कन्याओं का विधिवत पूजन व सम्मान किया गया।

2. ब्रह्मलीन श्री मौनी महाराज जी की स्मृति चित्रावली

श्री श्री 1008 रामकिंकर दास मौनी महाराज जी की ब्रह्मलीन अवस्था के पश्चात की दुर्लभ एवं भावनात्मक छवियाँ।

3. बाढ़ राहत भोजन वितरण अभियान – 14 अगस्त 2021

श्री हनुमान गढ़ी सेवाश्रम ट्रस्ट द्वारा बाढ़ प्रभावित क्षेत्रों में सैकड़ों जरूरतमंदों को भोजन और लंच पैकेट वितरित किए गए।

4. शहीद परिवार सम्मान समारोह – 23 जनवरी 2021

ट्रस्ट द्वारा देश के वीर शहीदों के परिवारों को भावभीनी श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए उन्हें सम्मानित किया गया।

5. ब्रह्मलीन श्री मौनी महाराज जी का समाधि स्थल दर्शन – 9 नवम्बर 2020

श्री मौनी बाबा की ब्रह्मलीन तिथि पर उनके पावन समाधि स्थल की आध्यात्मिक छवियाँ एवं दर्शन।

6. मौनी महाराज जी के प्रथम पुण्यतिथि पर श्रीमदभागवत कथा कार्यक्रम की झलकियां

श्री मौनी बाबा की प्रथम पुण्यतिथि के अवसर पर 10 दिवसीय संगीतमय कथा प्रवचन एवं विशाल भंडारा आयोजित किया गया, जिसमें श्रद्धालुओं ने भक्ति एवं सेवा भाव से सहभागिता की।

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